ललिता सहस्रनाम
शब्दार्थ
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परिचय
ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् आदि शक्ति देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी के एक हजार दिव्य नामों का संग्रह है। यह ब्रह्माण्ड पुराण के ललितोपाख्यान में वर्णित है। इस स्तोत्र में हयग्रीव (भगवान विष्णु का एक अवतार) ने ऋषि अगस्त्य को देवी के सहस्र नाम सुनाए।
कथा के अनुसार भण्डासुर नामक राक्षस ने तीनों लोकों को त्रस्त कर दिया था। तब देवी ललिता चिदग्निकुण्ड से प्रकट हुईं और भण्डासुर का वध कर सृष्टि की रक्षा की। यह स्तोत्र देवी के उस दिव्य स्वरूप, शक्तियों और लीलाओं का वर्णन करता है।
महत्व
ललिता सहस्रनाम शाक्त सम्प्रदाय का सर्वोच्च स्तोत्र माना जाता है। श्रीविद्या उपासना में इसका विशेष स्थान है। प्रत्येक नाम देवी की किसी शक्ति, गुण अथवा दिव्य लीला का वर्णन करता है। यह स्तोत्र कुण्डलिनी योग, श्रीचक्र और तन्त्र शास्त्र के गूढ़ रहस्यों को नामों के माध्यम से प्रकट करता है। इसके पाठ से भक्ति, ज्ञान, ऐश्वर्य और अन्ततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पाठ विधि
- शुक्रवार को इस स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी होता है।
- नवरात्रि के नौ दिनों में प्रतिदिन पाठ करना अत्यन्त शुभ है।
- पाठ से पूर्व ध्यान श्लोकों का पाठ करें और देवी ललिता का ध्यान करें।
- कुमकुम, लाल पुष्प और लाल वस्त्र से देवी की पूजा करके पाठ करें।
- पाठ के समय मन में श्रीचक्र का ध्यान करना उत्तम माना जाता है।
- पूर्णिमा के दिन पाठ करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।