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वेद पथ

शिव ताण्डव स्तोत्रम्

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प्रदर्शन

परिचय

शिव ताण्डव स्तोत्रम् भगवान शिव की स्तुति में रचित सबसे शक्तिशाली स्तोत्रों में से एक है। इसकी रचना लंकापति रावण ने की थी, जो भगवान शिव के परम भक्त थे। यह स्तोत्र भगवान शिव के ताण्डव नृत्य — सृष्टि के संहार और सृजन के नृत्य — का अत्यन्त ओजस्वी वर्णन करता है।

रावण एक महान विद्वान, वेदों का ज्ञाता और संगीत का पारखी था। उसने कैलास पर्वत को उठाने का प्रयास किया, जिससे भगवान शिव क्रोधित हुए और उन्होंने अपने पैर के अँगूठे से कैलास को दबा दिया। रावण की भुजा कैलास के नीचे दब गई। तब रावण ने इस स्तोत्र की रचना कर भगवान शिव की स्तुति की और उन्हें प्रसन्न किया।

महत्व

शिव ताण्डव स्तोत्रम् की छन्द रचना अत्यन्त लयबद्ध और ऊर्जावान है। इसमें प्रयुक्त संस्कृत के दीर्घ समास शिव के विराट स्वरूप का बोध कराते हैं। यह स्तोत्र साहस, शक्ति और भक्ति का संचार करता है। इसके पाठ से भय का नाश होता है, आत्मबल बढ़ता है और शिव कृपा की प्राप्ति होती है। अन्तिम दो श्लोक (१६-१७) फलश्रुति हैं, जो बताते हैं कि इस स्तोत्र का पाठ — विशेषकर प्रदोष काल में — पवित्रता, भक्ति और स्थायी ऐश्वर्य प्रदान करता है।

पाठ विधि

  • इस स्तोत्र का पाठ सोमवार को या शिवरात्रि के दिन विशेष फलदायी होता है।
  • पाठ से पूर्व शिवलिंग पर जल अर्पित करें और ध्यान लगाएँ।
  • स्तोत्र का पाठ शुद्ध उच्चारण और लयबद्ध स्वर में करना चाहिए।
  • प्रदोष काल (त्रयोदशी की सन्ध्या) में पाठ करना विशेष शुभ है — यह श्लोक १७ में स्वयं कहा गया है।
  • श्रावण मास में प्रतिदिन पाठ करना अत्यन्त शुभ माना जाता है।