मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध करि, परुवहु मेरी आस॥
अर्थ हे माँ लक्ष्मी, कृपा करके हृदय में निवास करो। मनोकामनाएँ सिद्ध करके मेरी आशाएँ पूर्ण करो।
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदम्बिका।
अर्थ यही मेरी अरदास है, हाथ जोड़कर विनती करता हूँ। सब प्रकार से सुवास (शुभ निवास) करो, जगदम्बिका जननी की जय हो।
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही।
ज्ञान, बुद्धि, विद्या दो मोही॥
अर्थ हे सिन्धु पुत्री, मैं तुम्हारा स्मरण करता हूँ। मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या प्रदान करो।
तुम समान नहिं कोई उपकारी।
सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
अर्थ तुम्हारे समान कोई उपकारी नहीं है। सब प्रकार से हमारी आशा पूर्ण करो।
जय जय जगत जननी जगदम्बा।
सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
अर्थ जगत जननी जगदम्बा की जय जय हो। सबकी तुम ही आश्रय (अवलम्ब) हो।
तुम ही हो सब घट घट वासी।
विनती यही हमारी खासी॥
अर्थ तुम ही सबके हृदय में निवास करती हो। यही हमारी विशेष विनती है।
जगजननी जय सिन्धु कुमारी।
दीनन की तुम हो हितकारी॥
अर्थ जगत की जननी, सिन्धु कुमारी की जय हो। दीनों की तुम हितकारी हो।
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी।
कृपा करौ जग जननि भवानी॥
अर्थ हे महारानी, मैं नित्य तुमसे विनती करता हूँ। हे जगजननी भवानी, कृपा करो।
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी।
सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
अर्थ किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ? अपराध भुलाकर मेरी सुध लीजिए।
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी।
जगजननी विनती सुन मोरी॥
अर्थ कृपा दृष्टि से मेरी ओर देखो। हे जगजननी, मेरी विनती सुनो।
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता।
संकट हरो हमारी माता॥
अर्थ ज्ञान, बुद्धि और सुख की दाता की जय हो। हमारी माता, संकट दूर करो।
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो।
चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
अर्थ जब विष्णु ने क्षीरसागर मथवाया, तब समुद्र में चौदह रत्न प्राप्त हुए।
चौदह रत्न में तुम सुखरासी।
सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥
अर्थ चौदह रत्नों में तुम सुख की राशि हो। दासी बनकर प्रभु की सेवा की।
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा।
रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
अर्थ जब जब जहाँ प्रभु ने जन्म लिया, रूप बदलकर वहाँ सेवा की।
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।
लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
अर्थ जब स्वयं विष्णु ने मानव शरीर धारण किया और अवधपुरी (अयोध्या) में अवतार लिया।
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं।
सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अर्थ तब तुम जनकपुर में प्रकट हुईं। हृदय में प्रसन्नता से पुलकित होकर सेवा की।
अपनाया तोहि अन्तर्यामी।
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
अर्थ अन्तर्यामी ने तुम्हें अपनाया। तुम विश्वविदित तीनों लोकों की स्वामिनी हो।
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी।
कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
अर्थ तुम्हारे समान प्रबल शक्ति कोई और नहीं। कहाँ तक तुम्हारी महिमा बखान करूँ।
मन क्रम वचन करै सेवकाई।
मन इच्छित वाञ्छित फल पाई॥
अर्थ जो मन, कर्म और वचन से सेवा करे, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है।
तजि छल कपट और चतुराई।
पूजहिं विविध भाँति मनलाई॥
अर्थ छल, कपट और चतुराई त्यागकर, मन लगाकर विविध प्रकार से पूजा करें।
और हाल मैं कहौं बुझाई।
जो यह पाठ करै मन लाई॥
अर्थ और बात मैं समझाकर कहता हूँ — जो यह पाठ मन लगाकर करे।
ताको कोई कष्ट नोई।
मन इच्छित पावै फल सोई॥
अर्थ उसे कोई कष्ट नहीं होता। वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है।
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि।
त्रिविध ताप भव बन्धन हारिणी॥
अर्थ रक्षा करो, रक्षा करो, दुःख निवारिणी की जय हो। त्रिविध ताप और भव बन्धन को हरने वाली।
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै।
ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
अर्थ जो इस चालीसा को पढ़े या पढ़वाए, ध्यान लगाकर सुने या सुनाए।
ताकौ कोई न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
अर्थ उसे कोई रोग नहीं सताता। पुत्र आदि और धन-सम्पत्ति प्राप्त होती है।
पुत्रहीन अरु सम्पति हीना।
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
अर्थ पुत्रहीन, सम्पत्तिहीन, अन्धे, बहरे, कोढ़ी और अत्यन्त दीन व्यक्ति —
विप्र बोलाय कै पाठ करावै।
शंका दिल में कभी न लावै॥
अर्थ ब्राह्मण को बुलाकर पाठ करवाएँ और दिल में कभी शंका न रखें।
पाठ करावै दिन चालीसा।
ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
अर्थ चालीस दिन तक पाठ करवाएँ, उस पर गौरीश (शिव) भी कृपा करते हैं।
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।
कमी नहीं काहू की आवै॥
अर्थ बहुत सी सुख-सम्पत्ति प्राप्त होती है। किसी भी चीज़ की कमी नहीं आती।
बारह मास करै जो पूजा।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
अर्थ जो बारह महीने पूजा करे, उसके समान धन्य कोई दूसरा नहीं।
प्रतिदिन पाठ करै मन माही।
उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥
अर्थ जो प्रतिदिन मन में पाठ करे, उनके समान संसार में कोई नहीं।
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई।
लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
अर्थ बहुत प्रकार से मैं क्या बड़ाई करूँ। ध्यान लगाकर स्वयं परीक्षा ले लो।
करि विश्वास करै व्रत नेमा।
होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
अर्थ विश्वास करके व्रत और नियम का पालन करे, तो सिद्धि होती है और हृदय में प्रेम उत्पन्न होता है।
जय जय जय लक्ष्मी भवानी।
सब में व्यापित हो गुण खानी॥
अर्थ जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सबमें व्याप्त, गुणों की खान हो।
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।
तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥
अर्थ तुम्हारा तेज संसार में प्रबल है। तुम्हारे समान दयालु कोई नहीं।
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
अर्थ इस अनाथ की अब सुध लीजिए। संकट काटकर मुझे भक्ति प्रदान कीजिए।
भूल चूक करि क्षमा हमारी।
दर्शन दजै दशा निहारी॥
अर्थ हमारी भूल-चूक क्षमा करो। हमारी दशा देखकर दर्शन दो।
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी।
तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
अर्थ दर्शन बिना व्याकुल और बेचैन हूँ। तुम्हारे होते हुए भारी दुख सह रहा हूँ।
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में।
सब जानत हो अपने मन में॥
अर्थ मुझमें न ज्ञान है न बुद्धि। सब कुछ तुम अपने मन में जानती हो।
रुप चतुर्भुज करके धारण।
कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
अर्थ चतुर्भुज रूप धारण करके मेरे कष्ट का अब निवारण करो।
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई।
ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥
अर्थ किस प्रकार मैं बड़ाई करूँ, मुझमें ज्ञान-बुद्धि की अधिकता नहीं है।
त्राहि त्राहि दुःख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
अर्थ रक्षा करो, रक्षा करो, हे दुःख हारिणी, शीघ्र सब भय दूर करो। जय जय जय लक्ष्मी, शत्रुओं का नाश करो।
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥
अर्थ रामदास नित्य ध्यान धरकर हाथ जोड़कर विनय करते हैं। हे माता लक्ष्मी, दास पर दया की कोर (थोड़ी दया) करो।