श्री रघुबीर भक्त हितकारी।
सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥
अर्थ श्री रघुवीर भक्तों का हित करने वाले हैं। हे प्रभु, हमारी विनती सुन लीजिए।
निशि दिन ध्यान धरै जो कोई।
ता सम भक्त और नहीं होई॥
अर्थ रात-दिन जो कोई आपका ध्यान करे, उसके समान कोई अन्य भक्त नहीं होता।
ध्यान धरें शिवजी मन मांही।
ब्रह्मा, इन्द्र पार नहीं पाहीं॥
अर्थ शिवजी भी मन में आपका ध्यान धरते हैं। ब्रह्मा और इन्द्र भी आपका पार नहीं पाते।
दूत तुम्हार वीर हनुमाना।
जासु प्रभाव तिहुं पुर जाना॥
अर्थ आपके दूत वीर हनुमान हैं, जिनका प्रभाव तीनों लोकों में विख्यात है।
जय, जय, जय रघुनाथ कृपाला।
सदा करो संतन प्रतिपाला॥
अर्थ हे कृपालु रघुनाथ, जय जय जय हो। सदा सन्तों की रक्षा कीजिए।
तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला।
रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥
अर्थ हे कृपालु, आपकी भुजाएँ प्रचण्ड हैं। रावण को मारकर आपने देवताओं की रक्षा की।
तुम अनाथ के नाथ गोसाईं।
दीनन के हो सदा सहाई॥
अर्थ हे गोसाईं, आप अनाथों के नाथ हैं। दीनों के आप सदा सहायक हैं।
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं।
सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥
अर्थ ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पाते। सदा ईश (शिव) आपका यश गाते हैं।
चारिउ भेद भरत हैं साखी।
तुम भक्तन की लज्जा राखी॥
अर्थ चारों वेदों के भेद के भरत साक्षी हैं। आपने भक्तों की लाज रखी है।
गुण गावत शारद मन माहीं।
सुरपति ताको पार न पाहिं॥
अर्थ सरस्वती भी मन ही मन आपके गुण गाती हैं। देवराज इन्द्र भी उनका पार नहीं पाते।
नाम तुम्हार लेत जो कोई।
ता सम धन्य और नहीं होई॥
अर्थ आपका नाम जो कोई लेता है, उसके समान धन्य कोई और नहीं होता।
राम नाम है अपरम्पारा।
चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥
अर्थ राम नाम अपरम्पार (अनन्त) है, जिसे चारों वेदों ने पुकारा है।
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो।
तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो॥
अर्थ गणपति ने आपका नाम लिया, इसलिए आपने उन्हें प्रथम पूज्य बनाया।
शेष रटत नित नाम तुम्हारा।
महि को भार शीश पर धारा॥
अर्थ शेषनाग नित्य आपके नाम का जाप करते हैं। उन्होंने पृथ्वी का भार अपने शीश पर धारण किया है।
फूल समान रहत सो भारा।
पावत कोऊ न तुम्हरो पारा॥
अर्थ वह भार आपके नाम के प्रभाव से फूल के समान हल्का रहता है। कोई भी आपका पार नहीं पाता।
भरत नाम तुम्हरो उर धारो।
तासों कबहूं न रण में हारो॥
अर्थ भरत ने आपका नाम हृदय में धारण किया। इसलिए वे कभी रण में नहीं हारे।
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा।
सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥
अर्थ शत्रुघ्न के हृदय में आपका नाम प्रकाशित है। स्मरण करते ही शत्रुओं का नाश होता है।
लखन तुम्हारे आज्ञाकारी।
सदा करत सन्तन रखवारी॥
अर्थ लक्ष्मण आपके आज्ञाकारी हैं। वे सदा सन्तों की रखवाली करते हैं।
ताते रण जीते नहिं कोई।
युद्ध जुरे यमहूं किन होई॥
अर्थ इसलिए उन्हें रण में कोई जीत नहीं सका। युद्ध में यमराज भी उनका क्या कर सकें।
महालक्ष्मी धर अवतारा।
सब विधि करत पाप को छारा॥
अर्थ महालक्ष्मी ने अवतार धारण किया। वे सब प्रकार से पापों को भस्म करती हैं।
सीता राम पुनीता गायो।
भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥
अर्थ सीता-राम की पवित्र गाथा गाई गई। भुवनेश्वरी ने अपना प्रभाव दिखाया।
घट सों प्रकट भई सो आई।
जाको देखत चन्द्र लजाई॥
अर्थ वे घट (पृथ्वी) से प्रकट हुईं। जिन्हें देखकर चन्द्रमा भी लज्जित हो जाता है।
जो तुम्हरे नित पांव पलोटत।
नवो निद्धि चरणन में लोटत॥
अर्थ जो नित्य आपके पैर दबाती हैं, नौ निधियाँ उनके चरणों में लोटती हैं।
सिद्धि अठारह मंगलकारी।
सो तुम पर जावै बलिहारी॥
अर्थ अठारह मंगलकारी सिद्धियाँ आप पर बलिहारी जाती हैं।
औरहु जो अनेक प्रभुताई।
सो सीतापति तुमहिं बनाई॥
अर्थ और भी जो अनेक प्रभुता हैं, वे सब सीतापति ने आपको प्रदान कीं।
इच्छा ते कोटिन संसारा।
रचत न लागत पल की बारा॥
अर्थ इच्छा मात्र से करोड़ों संसार रचने में पल भर भी नहीं लगता।
जो तुम्हरे चरणन चित लावै।
ताकी मुक्ति अवसि हो जावै॥
अर्थ जो आपके चरणों में चित्त लगाए, उसकी मुक्ति अवश्य हो जाती है।
सुनहु राम तुम तात हमारे।
तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥
अर्थ सुनिए हे राम, आप हमारे पिता समान हैं। भरत कुल ने आपको पूज्य प्रचारित किया।
तुमहिं देव कुल देव हमारे।
तुम गुरु देव प्राण के प्यारे॥
अर्थ आप ही हमारे कुल देव हैं। आप गुरुदेव, प्राणों से प्यारे हैं।
जो कुछ हो सो तुमहिं राजा।
जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥
अर्थ जो कुछ भी हो, आप ही राजा हैं। जय जय जय प्रभु, हमारी लाज रखिए।
राम आत्मा पोषण हारे।
जय जय जय दशरथ के प्यारे॥
अर्थ हे राम, आप आत्मा का पोषण करने वाले हैं। जय जय जय दशरथ के प्यारे।
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा।
नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा॥
अर्थ जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूप। निर्गुण ब्रह्म, अखण्ड और अनुपम।
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी।
सत्य सनातन अन्तर्यामी॥
अर्थ सत्य सत्य, जय हो सत्यव्रत स्वामी। सत्य सनातन, अन्तर्यामी।
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै।
सो निश्चय चारों फल पावै॥
अर्थ सत्य भजन में जो आपका गुणगान करे, वह निश्चय ही चारों पुरुषार्थ फल प्राप्त करता है।
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं।
तुमने भक्तिहिं सब सिधि दीन्हीं॥
अर्थ गौरीपति (शिव) ने सत्य शपथ ली है — आपने भक्ति से ही सब सिद्धियाँ प्रदान की हैं।
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा।
नमो नमो जय जगपति भूपा॥
अर्थ हे ज्ञान स्वरूप, हृदय में ज्ञान दीजिए। नमो नमो, जय जगत के पति और भूपति।
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा।
नाम तुम्हार हरत संतापा॥
अर्थ धन्य धन्य हैं आप, धन्य है आपका प्रताप। आपका नाम सारे सन्ताप हर लेता है।
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया।
बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥
अर्थ सत्य और शुद्ध, देवताओं ने मुख से गाया। दुन्दुभी बजी और शंख बजाया गया।
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन।
तुम ही हो हमरे तन-मन धन॥
अर्थ सत्य सत्य, आप सत्य सनातन हैं। आप ही हमारे तन, मन और धन हैं।
याको पाठ करे जो कोई।
ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥
अर्थ इसका पाठ जो कोई करे, उसके हृदय में ज्ञान प्रकट होता है।
आवागमन मिटै तिहि केरा।
सत्य वचन माने शिव मेरा॥
अर्थ उसका आवागमन (जन्म-मरण का चक्र) मिट जाता है। मेरे शिव का यह सत्य वचन है।
और आस मन में जो होई।
मनवांछित फल पावे सोई॥
अर्थ और मन में जो भी आशा हो, वह मनवांछित फल प्राप्त करता है।
तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै।
तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥
अर्थ तीनों काल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) जो ध्यान लगाए, तुलसी दल और फूल चढ़ाए।
साग पत्र सो भोग लगावै।
सो नर सकल सिद्धता पावै॥
अर्थ साग-पत्र का भोग लगाए, वह मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त करता है।
अन्त समय रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि भक्त कहाई॥
अर्थ अन्त समय में रघुवर के धाम को जाता है। जहाँ जन्म लेकर हरि भक्त कहलाता है।
श्री हरिदास कहै अरु गावै।
सो बैकुण्ठ धाम को पावै॥
अर्थ श्री हरिदास कहते और गाते हैं — वह वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है।
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।
हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥
अर्थ सात दिन तक नियमपूर्वक जो चित्त लगाकर पाठ करे, हरिदास कहते हैं कि हरि की कृपा से वह अवश्य भक्ति को प्राप्त करता है।
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय।
जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥
अर्थ राम चालीसा जो राम के चरणों में चित्त लगाकर पढ़े, मन में जो भी इच्छा करे, वह सब सिद्ध हो जाती है।