पहले साई के चरणों में, अपना शीश नमाऊं मैं।
कैसे शिरडी साई आए, सारा हाल सुनाऊं मैं॥
अर्थ सबसे पहले साई के चरणों में अपना मस्तक झुकाता हूँ। शिरडी में साई कैसे आए, वह सारी कहानी सुनाता हूँ।
कौन है माता, पिता कौन है, ये न किसी ने भी जाना।
कहां जन्म साई ने धारा, प्रश्न पहेली रहा बना॥
अर्थ उनकी माता कौन है, पिता कौन है, यह किसी ने भी नहीं जाना। साई ने कहाँ जन्म लिया, यह प्रश्न एक पहेली बना रहा।
कोई कहे अयोध्या के, ये रामचन्द्र भगवान हैं।
कोई कहता साई बाबा, पवन पुत्र हनुमान हैं॥
अर्थ कोई कहता है कि ये अयोध्या के भगवान रामचन्द्र हैं। कोई कहता है कि साई बाबा पवनपुत्र हनुमान हैं।
कोई कहता मंगल मूर्ति, श्री गजानंद हैं साई।
कोई कहता गोकुल मोहन, देवकी नन्दन हैं साई॥
अर्थ कोई कहता है कि साई मंगलमूर्ति श्री गणेश हैं। कोई कहता है कि साई गोकुल के मोहन, देवकी के पुत्र कृष्ण हैं।
शंकर समझे भक्त कई तो, बाबा को भजते रहते।
कोई कह अवतार दत्त का, पूजा साई की करते॥
अर्थ कई भक्त उन्हें शंकर समझकर भजते रहते हैं। कोई दत्तात्रेय का अवतार कहकर साई की पूजा करते हैं।
कुछ भी मानो उनको तुम, पर साई हैं सच्चे भगवान।
बड़े दयालु दीनबन्धु, कितनों को दिया जीवन दान॥
अर्थ तुम उन्हें कुछ भी मानो, परन्तु साई सच्चे भगवान हैं। वे बड़े दयालु और दीनबन्धु हैं, कितनों को जीवनदान दिया।
कई वर्ष पहले की घटना, तुम्हें सुनाऊंगा मैं बात।
किसी भाग्यशाली की, शिरडी में आई थी बारात॥
अर्थ कई वर्ष पहले की घटना तुम्हें सुनाता हूँ। किसी भाग्यशाली की बारात शिरडी में आई थी।
आया साथ उसी के था, बालक एक बहुत सुन्दर।
आया, आकर वहीं बस गया, पावन शिरडी किया नगर॥
अर्थ उसी बारात के साथ एक बहुत सुन्दर बालक आया। आकर वहीं बस गया और शिरडी को पावन नगर बना दिया।
कई दिनों तक भटकता, भिक्षा माँग उसने दर-दर।
और दिखाई ऐसी लीला, जग में जो हो गई अमर॥
अर्थ कई दिनों तक दर-दर भिक्षा माँगता भटकता रहा। और ऐसी अमर लीला दिखाई जो जगत में अमर हो गई।
जैसे-जैसे अमर उमर बढ़ी, बढ़ती ही वैसे गई शान।
घर-घर होने लगा नगर में, साई बाबा का गुणगान॥
अर्थ जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, वैसे-वैसे उनकी शान बढ़ती गई। नगर में घर-घर साई बाबा का गुणगान होने लगा।
दिग्-दिगन्त में लगा गूंजने, फिर तो साईंजी का नाम।
दीन-दुखी की रक्षा करना, यही रहा बाबा का काम॥
अर्थ फिर तो सभी दिशाओं में साई का नाम गूँजने लगा। दीन-दुखियों की रक्षा करना, यही बाबा का काम रहा।
बाबा के चरणों में जाकर, जो कहता मैं हूं निर्धन।
दया उसी पर होती उनकी, खुल जाते दुःख के बंधन॥
अर्थ बाबा के चरणों में जाकर जो कहता कि मैं निर्धन हूँ, उसी पर उनकी दया होती थी और दुःख के बंधन खुल जाते थे।
कभी किसी ने मांगी भिक्षा, दो बाबा मुझको संतान।
एवं अस्तु तब कहकर साई, देते थे उसको वरदान॥
अर्थ कभी किसी ने भिक्षा माँगी कि बाबा मुझे संतान दो। तब साई एवं अस्तु कहकर वरदान दे देते थे।
स्वयं दुःखी बाबा हो जाते, दीन-दुःखी जन का लख हाल।
अन्तःकरण श्री साई का, सागर जैसा रहा विशाल॥
अर्थ दीन-दुखी लोगों का हाल देखकर बाबा स्वयं दुखी हो जाते थे। श्री साई का हृदय सागर के समान विशाल था।
भक्त एक मद्रासी आया, घर का बहुत बड़ा धनवान।
माल खजाना बेहद उसका, केवल नहीं रही संतान॥
अर्थ एक मद्रासी भक्त आया जो बहुत बड़ा धनवान था। उसके पास अपार धन था, परन्तु संतान नहीं थी।
लगा मनाने साईनाथ को, बाबा मुझ पर दया करो।
झंझा से झंकृत नैया को, तुम्हीं मेरी पार करो॥
अर्थ वह साईनाथ को मनाने लगा - बाबा मुझ पर दया करो। तूफान से हिलती मेरी नैया को तुम्हीं पार करो।
कुलदीपक के बिना अंधेरा, छाया हुआ घर में मेरे।
इसलिए आया हूँ बाबा, होकर शरणागत तेरे॥
अर्थ कुलदीपक (संतान) के बिना मेरे घर में अंधेरा छाया हुआ है। इसलिए तेरा शरणागत होकर आया हूँ बाबा।
कुलदीपक के अभाव में, व्यर्थ है दौलत की माया।
आज भिखारी बनकर बाबा, शरण तुम्हारी मैं आया॥
अर्थ कुलदीपक के बिना धन-दौलत सब व्यर्थ है। आज भिखारी बनकर बाबा तुम्हारी शरण में आया हूँ।
दे दो मुझको पुत्र-दान, मैं ऋणी रहूंगा जीवन भर।
और किसी की आशा न मुझको, सिर्फ भरोसा है तुम पर॥
अर्थ मुझे पुत्र-दान दे दो, मैं जीवन भर ऋणी रहूँगा। मुझे और किसी की आशा नहीं, बस तुम पर भरोसा है।
अनुनय-विनय बहुत की उसने, चरणों में धर के शीश।
तब प्रसन्न होकर बाबा ने, दिया भक्त को यह आशीश॥
अर्थ उसने चरणों में मस्तक रखकर बहुत अनुनय-विनय की। तब प्रसन्न होकर बाबा ने भक्त को यह आशीर्वाद दिया।
अल्ला भला करेगा तेरा, पुत्र जन्म हो तेरे घर।
कृपा रहेगी तुझ पर उसकी, और तेरे उस बालक पर॥
अर्थ अल्लाह तेरा भला करेगा, तेरे घर पुत्र जन्म होगा। उसकी कृपा तुझ पर और तेरे बालक पर रहेगी।
अब तक नहीं किसी ने पाया, साई की कृपा का पार।
पुत्र रत्न दे मद्रासी को, धन्य किया उसका संसार॥
अर्थ अब तक किसी ने साई की कृपा का पार नहीं पाया। मद्रासी भक्त को पुत्र रत्न देकर उसका संसार धन्य कर दिया।
तन-मन से जो भजे उसी का, जग में होता है उद्धार।
सांच को आंच नहीं हैं कोई, सदा झूठ की होती हार॥
अर्थ तन-मन से जो भजता है उसी का जगत में उद्धार होता है। सच को कोई आँच नहीं, सदा झूठ की हार होती है।
मैं हूं सदा सहारे उसके, सदा रहूँगा उसका दास।
साई जैसा प्रभु मिला है, इतनी ही कम है क्या आस॥
अर्थ मैं सदा उनके सहारे हूँ, सदा उनका दास रहूँगा। साई जैसा प्रभु मिला है, इतनी आस क्या कम है।
मेरा भी दिन था एक ऐसा, मिलती नहीं मुझे रोटी।
तन पर कपड़ा दूर रहा था, शेष रही नन्हीं सी लंगोटी॥
अर्थ मेरा भी एक ऐसा दिन था जब मुझे रोटी नहीं मिलती थी। तन पर कपड़ा तो दूर, बस एक छोटी सी लंगोटी शेष थी।
सरिता सन्मुख होने पर भी, मैं प्यासा का प्यासा था।
दुर्दिन मेरा मेरे ऊपर, दावाग्नी बरसाता था॥
अर्थ नदी सामने होने पर भी मैं प्यासा का प्यासा था। मेरा दुर्दिन मुझ पर दावाग्नी बरसा रहा था।
धरती के अतिरिक्त जगत में, मेरा कुछ अवलम्ब न था।
बना भिखारी मैं दुनिया में, दर-दर ठोकर खाता था॥
अर्थ धरती के सिवा जगत में मेरा कोई सहारा नहीं था। मैं दुनिया में भिखारी बनकर दर-दर ठोकरें खाता था।
ऐसे में एक मित्र मिला जो, परम भक्त साई का था।
जंजालों से मुक्त मगर, जगती में वह भी मुझसा था॥
अर्थ ऐसे में एक मित्र मिला जो साई का परम भक्त था। जंजालों से मुक्त था, पर संसार में वह भी मेरे जैसा ही था।
बाबा के दर्शन की खातिर, मिल दोनों ने किया विचार।
साई जैसे दया मूर्ति के, दर्शन को हो गए तैयार॥
अर्थ बाबा के दर्शन के लिए दोनों ने मिलकर विचार किया। दयामूर्ति साई के दर्शन को हम तैयार हो गए।
पावन शिरडी नगर में जाकर, देख मतवाली मूरति।
धन्य जन्म हो गया कि हमने, जब देखी साई की सूरति॥
अर्थ पवित्र शिरडी नगर में जाकर मनमोहक मूर्ति देखी। जब साई की सूरत देखी तो जन्म धन्य हो गया।
जब से किए हैं दर्शन हमने, दुःख सारा काफूर हो गया।
संकट सारे मिटै और, विपदाओं का अन्त हो गया॥
अर्थ जब से हमने दर्शन किए, सारा दुःख दूर हो गया। सभी संकट मिटे और विपदाओं का अन्त हो गया।
मान और सम्मान मिला, भिक्षा में हमको बाबा से।
प्रतिबिम्बित हो उठे जगत में, हम साई की आभा से॥
अर्थ बाबा से भिक्षा में हमें मान और सम्मान मिला। साई की आभा से हम जगत में प्रतिबिम्बित हो उठे।
बाबा ने सन्मान दिया है, मान दिया इस जीवन में।
इसका ही संबल ले मैं, हंसता जाऊंगा जीवन में॥
अर्थ बाबा ने इस जीवन में सम्मान और मान दिया है। इसी का सहारा लेकर मैं जीवन में हँसता जाऊँगा।
साई की लीला का मेरे, मन पर ऐसा असर हुआ।
लगता जगती के कण-कण में, जैसे हो वह भरा हुआ॥
अर्थ साई की लीला का मेरे मन पर ऐसा प्रभाव हुआ कि लगता है जगत के कण-कण में वह भरा हुआ है।
काशीराम बाबा का भक्त, शिरडी में रहता था।
मैं साई का साई मेरा, वह दुनिया से कहता था॥
अर्थ काशीराम बाबा का भक्त था जो शिरडी में रहता था। वह दुनिया से कहता था - मैं साई का और साई मेरा।
सीकर स्वयं वस्त्र बेचता, ग्राम-नगर बाजारों में।
झंकृत उसकी हृदय तंत्री थी, साई की झंकारों में॥
अर्थ वह स्वयं सिलकर वस्त्र बेचता था गाँवों-शहरों के बाजारों में। उसके हृदय की तार साई की झंकारों में बजती थी।
स्तब्ध निशा थी, थे सोय, रजनी आंचल में चाँद सितारे।
नहीं सूझता रहा हाथ को, हाथ तिमिर के मारे॥
अर्थ रात स्तब्ध थी, रात्रि के आँचल में चाँद-तारे सो रहे थे। अंधेरे के कारण हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था।
वस्त्र बेचकर लौट रहा था, हाय! हाट से काशी।
विचित्र बड़ा संयोग कि उस दिन, आता था एकाकी॥
अर्थ काशीराम हाट से वस्त्र बेचकर लौट रहा था। विचित्र संयोग था कि उस दिन वह अकेला आ रहा था।
घेर राह में खड़े हो गए, उसे कुटिल अन्यायी।
मारो काटो लूटो इसकी ही, ध्वनि पड़ी सुनाई॥
अर्थ रास्ते में कुटिल अन्यायियों ने उसे घेर लिया। मारो, काटो, लूटो - यही आवाज सुनाई पड़ी।
लूट पीटकर उसे वहाँ से, कुटिल गए चम्पत हो।
आघातों में मर्माहत हो, उसने दी संज्ञा खो॥
अर्थ उसे लूटकर-पीटकर दुष्ट वहाँ से भाग गए। आघातों से व्यथित होकर उसने बेहोश होकर संज्ञा खो दी।
बहुत देर तक पड़ा रह वह, वहीं उसी हालत में।
जाने कब कुछ होश हो उठा, वहीं उसकी पलक में॥
अर्थ वह बहुत देर तक उसी हालत में वहीं पड़ा रहा। न जाने कब उसकी पलकों में थोड़ा होश आया।
अनजाने ही उसके मुंह से, निकल पड़ा था साई।
जिसकी प्रतिध्वनि शिरडी में, बाबा को पड़ी सुनाई॥
अर्थ अनजाने में ही उसके मुँह से साई का नाम निकल पड़ा। जिसकी प्रतिध्वनि शिरडी में बाबा को सुनाई पड़ी।
क्षुब्ध हो उठा मानस उनका, बाबा गए विकल हो।
लगता जैसे घटना सारी, घटी उन्हीं के सन्मुख हो॥
अर्थ उनका मन क्षुब्ध हो उठा, बाबा विकल हो गए। लगता था जैसे सारी घटना उन्हीं के सामने घटी हो।
उन्मादी से इधर-उधर तब, बाबा लेगे भटकने।
सन्मुख चीजें जो भी आई, उनको लगने पटकने॥
अर्थ तब बाबा उन्मादी की तरह इधर-उधर भटकने लगे। सामने जो भी चीज आई, उसे पटकने लगे।
और धधकते अंगारों में, बाबा ने अपना कर डाला।
हुए सशंकित सभी वहाँ, लख ताण्डवनृत्य निराला॥
अर्थ और बाबा ने धधकते अंगारों में अपना हाथ डाल दिया। यह अनोखा ताण्डव देखकर सभी वहाँ भयभीत हो गए।
समझ गए सब लोग, कि कोई भक्त पड़ा संकट में।
क्षुभित खड़े थे सभी वहाँ, पर पड़े हुए विस्मय में॥
अर्थ सब लोग समझ गए कि कोई भक्त संकट में पड़ा है। सभी वहाँ क्षुभित खड़े थे, परन्तु विस्मय में पड़े हुए थे।
उसे बचाने की ही खातिर, बाबा आज विकल है।
उसकी ही पीड़ा से पीडित, उनकी अन्तःस्थल है॥
अर्थ उसे बचाने के लिए ही बाबा आज विकल हैं। उसकी पीड़ा से उनका अन्तःकरण पीड़ित है।
इतने में ही विविध ने अपनी, विचित्रता दिखलाई।
लख कर जिसको जनता की, श्रद्धा सरिता लहराई॥
अर्थ इतने में ही विधाता ने अपनी विचित्रता दिखाई। जिसे देखकर जनता की श्रद्धा की नदी लहरा उठी।
लेकर संज्ञाहीन भक्त को, गाड़ी एक वहाँ आई।
सन्मुख अपने देख भक्त को, साई की आंखें भर आई॥
अर्थ बेहोश भक्त को लेकर एक गाड़ी वहाँ आई। अपने सामने भक्त को देखकर साई की आँखें भर आईं।
शांत, धीर, गंभीर, सिन्धु सा, बाबा का अन्तःस्थल।
आज न जाने क्यों रह-रहकर, हो जाता था चंचल॥
अर्थ सागर की तरह शांत, धीर और गंभीर बाबा का हृदय आज न जाने क्यों बार-बार चंचल हो जाता था।
आज दया की मूर्ति स्वयं था, बना हुआ उपचारी।
और भक्त के लिए आज था, देव बना प्रतिहारी॥
अर्थ आज दया की मूर्ति स्वयं उपचार करने वाला बना हुआ था। और भक्त के लिए आज देव स्वयं द्वारपाल बना था।
आज भक्ति की विषम परीक्षा में, सफल हुआ था काशी।
उसके ही दर्शन की खातिर थे, उमड़े नगर-निवासी॥
अर्थ आज भक्ति की कठिन परीक्षा में काशीराम सफल हुआ। उसके दर्शन के लिए नगर के निवासी उमड़ पड़े।
जब भी और जहां भी कोई, भक्त पड़े संकट में।
उसकी रक्षा करने बाबा, आते हैं पलभर में॥
अर्थ जब भी और जहाँ भी कोई भक्त संकट में पड़े, उसकी रक्षा करने बाबा पलभर में आ जाते हैं।
युग-युग का है सत्य यह, नहीं कोई नई कहानी।
आपतग्रस्त भक्त जब होता, जाते खुद अन्तर्यामी॥
अर्थ यह युगों-युगों का सत्य है, कोई नई कहानी नहीं। जब भक्त आपत्तिग्रस्त होता है, अन्तर्यामी स्वयं जाते हैं।
भेद-भाव से परे पुजारी, मानवता के थे साई।
जितने प्यारे हिन्दु-मुस्लिम, उतने ही थे सिक्ख ईसाई॥
अर्थ साई भेदभाव से परे मानवता के पुजारी थे। जितने प्यारे हिन्दू-मुस्लिम थे, उतने ही सिक्ख और ईसाई भी थे।
भेद-भाव मन्दिर-मस्जिद का, तोड़-फोड़ बाबा ने डाला।
राह रहीम सभी उनके थे, कृष्ण करीम अल्लाताला॥
अर्थ बाबा ने मन्दिर-मस्जिद का भेदभाव तोड़ डाला। राम, रहीम, कृष्ण, करीम और अल्लाह सब उनके लिए एक थे।
घण्टे की प्रतिध्वनि से गूंजा, मस्जिद का कोना-कोना।
मिले परस्पर हिन्दु-मुस्लिम, प्यार बढ़ा दिन-दिन दूना॥
अर्थ घण्टे की गूँज से मस्जिद का कोना-कोना गूँज उठा। हिन्दू-मुस्लिम परस्पर मिले और प्यार दिन-दिन दुगुना बढ़ता गया।
चमत्कार था कितना सुन्दर, परिचय इस काया ने दी।
और नीम कडुवाहट में भी, मिठास बाबा ने भर दी॥
अर्थ कितना सुन्दर चमत्कार था जो इस काया ने दिखाया। नीम की कड़वाहट में भी बाबा ने मिठास भर दी।
सब को स्नेह दिया साई ने, सबको संतुल प्यार किया।
जो कुछ जिसने भी चाहा, बाबा ने उसको वही दिया॥
अर्थ साई ने सबको स्नेह दिया, सबको समान प्यार किया। जिसने जो कुछ भी चाहा, बाबा ने उसे वही दिया।
ऐसे स्नेहशील भाजन का, नाम सदा जो जपा करे।
पर्वत जैसा दुःख न क्यों हो, पलभर में वह दूर टरे॥
अर्थ ऐसे स्नेहशील भगवान का नाम जो सदा जपे, पर्वत जैसा दुःख भी पलभर में दूर हो जाए।
साई जैसा दाता हम, अरे नहीं देखा कोई।
जिसके केवल दर्शन से ही, सारी विपदा दूर गई॥
अर्थ साई जैसा दाता हमने कोई नहीं देखा। जिसके केवल दर्शन से ही सारी विपदा दूर हो गई।
तन में साई, मन में साई, साई-साई भजा करो।
अपने तन की सुधि-बुधि खोकर, सुधि उसकी तुम किया करो॥
अर्थ तन में साई, मन में साई - साई-साई का भजन करो। अपनी सुध-बुध खोकर उनकी सुध किया करो।
जब तू अपनी सुधि तज, बाबा की सुधि किया करेगा।
और रात-दिन बाबा-बाबा, ही तू रटा करेगा॥
अर्थ जब तू अपनी सुध छोड़कर बाबा की सुध किया करेगा और रात-दिन बाबा-बाबा रटता रहेगा।
तो बाबा को अरे! विवश हो, सुधि तेरी लेनी ही होगी।
तेरी हर इच्छा बाबा को, पूरी ही करनी होगी॥
अर्थ तो बाबा को विवश होकर तेरी सुध लेनी ही होगी। तेरी हर इच्छा बाबा को पूरी करनी ही होगी।
जंगल, जगंल भटक न पागल, और ढूंढ़ने बाबा को।
एक जगह केवल शिरडी में, तू पाएगा बाबा को॥
अर्थ पागल! जंगल-जंगल मत भटक बाबा को ढूँढ़ने। एक ही जगह शिरडी में तू बाबा को पाएगा।
धन्य जगत में प्राणी है वह, जिसने बाबा को पाया।
दुःख में, सुख में प्रहर आठ हो, साई का ही गुण गाया॥
अर्थ धन्य है वह प्राणी जिसने बाबा को पाया। दुःख-सुख में सदा साई का ही गुणगान गाया।
गिरे संकटों के पर्वत, चाहे बिजली ही टूट पड़े।
साई का ले नाम सदा तुम, सन्मुख सब के रहो अड़े॥
अर्थ चाहे संकटों के पर्वत गिरें, चाहे बिजली टूट पड़े, साई का नाम लेकर सबके सामने अडिग रहो।
इस बूढ़े की सुन करामत, तुम हो जाओगे हैरान।
दंग रह गए सुनकर जिसको, जाने कितने चतुर सुजान॥
अर्थ इस बूढ़े की करामात सुनो, तुम हैरान हो जाओगे। जिसे सुनकर न जाने कितने चतुर और ज्ञानी दंग रह गए।
एक बार शिरडी में साधु, ढ़ोंगी था कोई आया।
भोली-भाली नगर-निवासी, जनता को था भरमाया॥
अर्थ एक बार शिरडी में कोई ढोंगी साधु आया। उसने भोली-भाली नगर की जनता को भरमा दिया।
जड़ी-बूटियां उन्हें दिखाकर, करने लगा वह भाषण।
कहने लगा सुनो श्रोतागण, घर मेरा है वृन्दावन॥
अर्थ जड़ी-बूटियाँ दिखाकर वह भाषण करने लगा। कहने लगा - सुनो श्रोताओ, मेरा घर वृन्दावन है।
औषधि मेरे पास एक है, और अजब इसमें शक्ति।
इसके सेवन करने से ही, हो जाती दुःख से मुक्ति॥
अर्थ मेरे पास एक औषधि है जिसमें अद्भुत शक्ति है। इसके सेवन से ही दुःखों से मुक्ति हो जाती है।
अगर मुक्त होना चाहो, तुम संकट से बीमारी से।
तो है मेरा नम्र निवेदन, हर नर से, हर नारी से॥
अर्थ अगर तुम संकट और बीमारी से मुक्त होना चाहो तो मेरा हर नर-नारी से नम्र निवेदन है।
लो खरीद तुम इसको, इसकी सेवन विधियां हैं न्यारी।
यद्यपि तुच्छ वस्तु है यह, गुण उसके हैं अति भारी॥
अर्थ इसे खरीद लो, इसकी सेवन विधियाँ अनोखी हैं। यद्यपि यह तुच्छ वस्तु है, परन्तु इसके गुण बहुत भारी हैं।
जो है संतति हीन यहां यदि, मेरी औषधि को खाए।
पुत्र-रत्न हो प्राप्त, अरे वह मुंह मांगा फल पाए॥
अर्थ यदि यहाँ कोई संतानहीन है तो मेरी औषधि खाए। पुत्र-रत्न प्राप्त हो और मुँहमाँगा फल पाए।
औषधि मेरी जो न खरीदे, जीवन भर पछताएगा।
मुझ जैसा प्राणी शायद ही, अरे यहां आ पाएगा॥
अर्थ मेरी औषधि जो नहीं खरीदेगा वह जीवन भर पछताएगा। मुझ जैसा प्राणी शायद ही यहाँ फिर आ पाएगा।
दुनिया दो दिनों का मेला है, मौज शौक तुम भी कर लो।
अगर इससे मिलता है, सब कुछ, तुम भी इसको ले लो॥
अर्थ दुनिया दो दिनों का मेला है, मौज-शौक तुम भी कर लो। अगर इससे सब कुछ मिलता है तो तुम भी इसे ले लो।
हैरानी बढ़ती जनता की, लख इसकी कारस्तानी।
प्रमुदित वह भी मन-ही-मन था, लख लोगों की नादानी॥
अर्थ उसकी कारस्तानी देखकर जनता की हैरानी बढ़ती गई। लोगों की नादानी देखकर वह भी मन-ही-मन प्रसन्न था।
खबर सुनाने बाबा को यह, गया दौड़कर सेवक एक।
सुनकर भृकुटी तनी और, विस्मरण हो गया सभी विवेक॥
अर्थ यह खबर सुनाने एक सेवक दौड़कर बाबा के पास गया। सुनकर बाबा की भौंह तन गई और सारा विवेक भुला बैठे।
हुक्म दिया सेवक को, सत्वर पकड़ दुष्ट को लाओ।
या शिरडी की सीमा से, कपटी को दूर भगाओ॥
अर्थ सेवक को हुक्म दिया - शीघ्र दुष्ट को पकड़कर लाओ या शिरडी की सीमा से कपटी को दूर भगाओ।
मेरे रहते भोली-भाली, शिरडी की जनता को।
कौन नीच ऐसा जो, साहस करता है छलने को॥
अर्थ मेरे रहते शिरडी की भोली-भाली जनता को कौन ऐसा नीच है जो छलने का साहस करता है।
पलभर में ऐसे ढोंगी, कपटी नीच लुटेरे को।
महानाश के महागर्त में पहुँचा, दूँ जीवन भर को॥
अर्थ पलभर में ऐसे ढोंगी, कपटी, नीच लुटेरे को महानाश के गड्ढे में जीवन भर के लिए पहुँचा दूँ।
तनिक मिला आभास मदारी, क्रूर, कुटिल अन्यायी को।
काल नाचता है अब सिर पर, गुस्सा आया साई को॥
अर्थ उस क्रूर, कुटिल अन्यायी मदारी को जरा सा आभास मिला कि साई को गुस्सा आया है, अब काल सिर पर नाच रहा है।
पलभर में सब खेल बंद कर, भागा सिर पर रखकर पैर।
सोच रहा था मन ही मन, भगवान नहीं है अब खैर॥
अर्थ पलभर में सारा खेल बन्द करके सिर पर पैर रखकर भागा। मन ही मन सोच रहा था कि अब खैर नहीं है।
सच है साई जैसा दानी, मिल न सकेगा जग में।
अंश ईश का साई बाबा, उन्हें न कुछ भी मुश्किल जग में॥
अर्थ सच है कि साई जैसा दानी जग में नहीं मिलेगा। साई बाबा ईश्वर के अंश हैं, उन्हें जग में कुछ भी मुश्किल नहीं।
स्नेह, शील, सौजन्य आदि का, आभूषण धारण कर।
बढ़ता इस दुनिया में जो भी, मानव सेवा के पथ पर॥
अर्थ स्नेह, शील और सौजन्य आदि का आभूषण धारण करके जो भी मानव सेवा के पथ पर बढ़ता है।
वही जीत लेता है जगती के, जन जन का अन्तःस्थल।
उसकी एक उदासी ही, जग को कर देती है विह्वल॥
अर्थ वही जगत के जन-जन का हृदय जीत लेता है। उसकी एक उदासी ही सारे जग को व्याकुल कर देती है।
जब-जब जग में भार पाप का, बढ़-बढ़ ही जाता है।
उसे मिटाने की ही खातिर, अवतारी ही आता है॥
अर्थ जब-जब जग में पाप का भार बढ़ता जाता है, उसे मिटाने के लिए ही अवतारी आता है।
पाप और अन्याय सभी कुछ, इस जगती का हर के।
दूर भगा देता दुनिया के, दानव को क्षण भर के॥
अर्थ इस जगत के सभी पाप और अन्याय हरकर दुनिया के दानवों को क्षणभर में दूर भगा देता है।
स्नेह सुधा की धार बरसने, लगती है इस दुनिया में।
गले परस्पर मिलने लगते, हैं जन-जन आपस में॥
अर्थ इस दुनिया में स्नेह रूपी अमृत की धार बरसने लगती है। जन-जन आपस में गले मिलने लगते हैं।
ऐसे अवतारी साई, मृत्युलोक में आकर।
समता का यह पाठ पढ़ाया, सबको अपना आप मिटाकर॥
अर्थ ऐसे अवतारी साई मृत्युलोक में आकर, अपने आप को मिटाकर, सबको समता का पाठ पढ़ाया।
नाम द्वारका मस्जिद का, रखा शिरडी में साई ने।
दाप, ताप, संताप मिटाया, जो कुछ आया साई ने॥
अर्थ साई ने शिरडी की मस्जिद का नाम द्वारकामाई रखा। जो भी आया उसका दाप, ताप और संताप मिटाया।
सदा याद में मस्त राम की, बैठे रहते थे साई।
पहर आठ ही राम नाम को, भजते रहते थे साई॥
अर्थ साई सदा राम की याद में मस्त बैठे रहते थे। आठों पहर राम नाम का भजन करते रहते थे।
सूखी-रूखी ताजी बासी, चाहे या होवे पकवान।
सौदा प्यार के भूखे साई की, खातिर थे सभी समान॥
अर्थ सूखी-रूखी, ताजी-बासी या पकवान - प्रेम के भूखे साई के लिए सब समान थे।
स्नेह और श्रद्धा से अपनी, जन जो कुछ दे जाते थे।
बड़े चाव से उस भोजन को, बाबा पावन करते थे॥
अर्थ जो कुछ भी लोग स्नेह और श्रद्धा से दे जाते थे, बाबा उस भोजन को बड़े चाव से पावन करते थे।
कभी-कभी मन बहलाने को, बाबा बाग में जाते थे।
प्रमुदित मन में निरख प्रकृति, छटा को वे होते थे॥
अर्थ कभी-कभी मन बहलाने के लिए बाबा बाग में जाते थे। प्रकृति की छटा निहारकर वे मन ही मन प्रसन्न होते थे।
रंग-बिरंगे पुष्प बाग के, मंद-मंद हिल-डुल करके।
बीहड़ वीराने मन में भी, स्नेह सलिल भर जाते थे॥
अर्थ बाग के रंग-बिरंगे फूल मंद-मंद हिलकर बीहड़ वीराने मन में भी स्नेह का जल भर देते थे।
ऐसी समुधुर बेला में भी, दुख आपात, विपदा के मारे।
अपने मन की व्यथा सुनाने, जन रहते बाबा को घेरे॥
अर्थ ऐसे मधुर समय में भी दुःख, आपत्ति और विपदा के मारे लोग अपनी व्यथा सुनाने बाबा को घेरे रहते।
सुनकर जिनकी करूणकथा को, नयन कमल भर आते थे।
दे विभूति हर व्यथा, शांति, उनके उर में भर देते थे॥
अर्थ उनकी करुण कथा सुनकर बाबा की आँखें भर आती थीं। विभूति देकर सबकी व्यथा हरते और उनके हृदय में शांति भर देते थे।
जाने क्या अद्भुत शिक्त, उस विभूति में होती थी।
जो धारण करते मस्तक पर, दुःख सारा हर लेती थी॥
अर्थ न जाने क्या अद्भुत शक्ति उस विभूति में होती थी। जो मस्तक पर धारण करता, उसका सारा दुःख हर लेती थी।
धन्य मनुज वे साक्षात् दर्शन, जो बाबा साई के पाए।
धन्य कमल कर उनके जिनसे, चरण-कमल वे परसाए॥
अर्थ धन्य हैं वे मनुष्य जिन्होंने बाबा साई के साक्षात् दर्शन पाए। धन्य हैं उनके कमल जैसे हाथ जिनसे उन्होंने चरण-कमल स्पर्श किए।
काश निर्भय तुमको भी, साक्षात् साई मिल जाता।
वर्षों से उजड़ा चमन अपना, फिर से आज खिल जाता॥
अर्थ काश तुम्हें भी निर्भय होकर साक्षात् साई मिल जाते। वर्षों से उजड़ा हमारा बगीचा आज फिर से खिल उठता।
गर पकड़ता मैं चरण श्री के, नहीं छोड़ता उम्रभर।
मना लेता मैं जरूर उनको, गर रूठते साई मुझ पर॥
अर्थ अगर मैं श्री साई के चरण पकड़ लेता तो उम्रभर नहीं छोड़ता। अगर साई मुझसे रूठते तो मैं उन्हें जरूर मना लेता।