बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बा फल, पिताम्बर शुभ साज॥
अर्थ हाथ में शोभित मधुर बाँसुरी है, नीले मेघ के समान श्यामवर्ण शरीर है। अरुण अधर बिम्बा फल के समान हैं, पीताम्बर का शुभ साज है।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥
अर्थ मन को मोहने वाली मदन छवि वाले, कृष्णचन्द्र महाराज की जय हो। हे प्रभु, कृपा करें और अपने भक्तों की लाज रखें।
जय यदुनन्दन जय जगवन्दन।
जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
अर्थ यदुकुल के आनन्द, जगत के वन्दनीय की जय हो। वसुदेव और देवकी के नन्दन की जय हो।
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे।
जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
अर्थ यशोदा के पुत्र, नन्द के दुलारे की जय हो। प्रभु जो भक्तों के नेत्रों के तारे हैं, उनकी जय हो।
जय नट-नागर नाग नथैया।
कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया॥
अर्थ नट-नागर, नागों को वश करने वाले की जय हो। कृष्ण कन्हैया, गायें चराने वाले की जय हो।
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो।
आओ दीनन कष्ट निवारो॥
अर्थ फिर नख (उँगली) पर प्रभु ने श्रेष्ठ पर्वत धारण किया। आओ दीनों का कष्ट निवारण करो।
वंशी मधुर अधर धरी तेरी।
होवे पूर्ण मनोरथ मेरो॥
अर्थ आपके अधरों पर मधुर वंशी धरी है। मेरा मनोरथ पूर्ण हो।
आओ हरि पुनि माखन चाखो।
आज लाज भारत की राखो॥
अर्थ आओ हरि, फिर माखन चखो। आज भारत की लाज रखो।
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे।
मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
अर्थ गोल कपोल और लाल ठोड़ी है। मृदु मुस्कान से मोहिनी शक्ति डालते हैं।
रंजित राजिव नयन विशाला।
मोर मुकुट वैजयंती माला॥
अर्थ रंजित कमल के समान विशाल नेत्र हैं। मोर मुकुट और वैजयंती माला शोभित है।
कुण्डल श्रवण पीतपट आछे।
कटि किंकणी काछन काछे॥
अर्थ कानों में कुण्डल और सुन्दर पीत वस्त्र हैं। कटि पर किंकणी (करधनी) और काछनी बाँधे हैं।
नील जलज सुन्दर तनु सोहे।
छवि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
अर्थ नीले कमल के समान सुन्दर शरीर शोभित है। छवि देखकर देवता, मनुष्य और मुनियों का मन मोहित हो जाता है।
मस्तक तिलक, अलक घुंघराले।
आओ कृष्ण बाँसुरी वाले॥
अर्थ मस्तक पर तिलक और घुँघराले अलक (बाल) हैं। आओ बाँसुरी वाले कृष्ण।
करि पय पान, पुतनहि तारयो।
अका बका कागासुर मारयो॥
अर्थ दूध पीकर पूतना का उद्धार किया। अका, बका और कागासुर का वध किया।
मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला।
भै शीतल, लखितहिं नन्दलाला॥
अर्थ मधुवन में जब अग्नि की ज्वाला भड़की, नन्दलाल को देखते ही शीतल हो गई।
सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई।
मसूर धार वारि वर्षाई॥
अर्थ जब इन्द्र ने क्रोधित होकर ब्रज पर चढ़ाई की। मूसलाधार जल बरसाया।
लगत-लगत ब्रज चहन बहायो।
गोवर्धन नखधारि बचायो॥
अर्थ ब्रज के बहते-बहते चारों ओर बाढ़ आ गई। गोवर्धन को नख पर धारण कर बचाया।
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई।
मुख महं चौदह भुवन दिखाई॥
अर्थ यशोदा के मन में बहुत भ्रम हुआ। मुख में चौदह भुवन दिखाये।
दुष्ट कंस अति उधम मचायो।
कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
अर्थ दुष्ट कंस ने बहुत उपद्रव मचाया। करोड़ों कमल पुष्प मँगवाये।
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें।
चरणचिन्ह दै निर्भय किन्हें॥
अर्थ तब तुमने कालिया नाग को नाथा। चरणचिह्न देकर निर्भय किया।
करि गोपिन संग रास विलासा।
सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
अर्थ गोपियों के संग रास-विलास किया। सबकी अभिलाषा पूर्ण की।
केतिक महा असुर संहारयो।
कंसहि केस पकड़ि दै मारयो॥
अर्थ कितने ही महा असुरों का संहार किया। कंस को केश पकड़कर मारा।
मात-पिता की बन्दि छुड़ाई।
उग्रसेन कहं राज दिलाई॥
अर्थ माता-पिता को बन्दी गृह से छुड़ाया। उग्रसेन को राज्य दिलाया।
महि से मृतक छहों सुत लायो।
मातु देवकी शोक मिटायो॥
अर्थ पृथ्वी से मृतक छहों पुत्रों को लाकर माता देवकी का शोक मिटाया।
भौमासुर मुर दैत्य संहारी।
लाये षट दश सहसकुमारी॥
अर्थ भौमासुर और मुर दैत्य का संहार किया। सोलह हजार कुमारियों को लाये।
दै भिन्हीं तृण चीर सहारा।
जरासिंधु राक्षस कहं मारा॥
अर्थ उन्हें पत्नी का सम्मान और आश्रय दिया। जरासन्ध राक्षस को मारा।
असुर बकासुर आदिक मारयो।
भक्तन के तब कष्ट निवारियो॥
अर्थ बकासुर आदि अनेक असुरों का वध किया। भक्तों का कष्ट निवारण किया।
दीन सुदामा के दुःख टारयो।
तंदुल तीन मूंठ मुख डारयो॥
अर्थ दीन सुदामा के दुख दूर किये। तीन मुट्ठी चावल मुख में डाले।
प्रेम के साग विदुर घर मांगे।
दुर्योधन के मेवा त्यागे॥
अर्थ विदुर के घर प्रेम से साग माँगे। दुर्योधन के मेवे त्याग दिये।
लखि प्रेम की महिमा भारी।
ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
अर्थ देखो प्रेम की कितनी भारी महिमा है। ऐसे श्याम दीनों के हितकारी हैं।
भारत के पारथ रथ हांके।
लिए चक्र कर नहिं बल ताके॥
अर्थ भारत (महाभारत) में अर्जुन का रथ हाँका। हाथ में चक्र लिया, बल का अभिमान नहीं किया।
निज गीता के ज्ञान सुनाये।
भक्तन हृदय सुधा वर्षाये॥
अर्थ अपनी गीता का ज्ञान सुनाया। भक्तों के हृदय में अमृत बरसाया।
मीरा थी ऐसी मतवाली।
विष पी गई बजाकर ताली॥
अर्थ मीरा ऐसी मतवाली भक्त थीं कि ताली बजाकर विष पी गईं।
राना भेजा सांप पिटारी।
शालिग्राम बने बनवारी॥
अर्थ राणा ने साँप की पिटारी भेजी, पर बनवारी (कृष्ण) शालिग्राम बन गये।
निज माया तुम विधिहिं दिखायो।
उर ते संशय सकल मिटायो॥
अर्थ अपनी माया ब्रह्मा को दिखाई। हृदय से समस्त संशय मिटा दिये।
तब शत निन्दा करी तत्काला।
जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
अर्थ शिशुपाल ने तभी सौ निन्दा पूरी की। और जीवन मुक्त हो गया शिशुपाल।
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।
दीनानाथ लाज अब जाई॥
अर्थ जब द्रौपदी ने पुकार लगाई, हे दीनानाथ, अब लाज जाती है।
तुरतहिं वसन बने नन्दलाला।
बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
अर्थ तुरन्त नन्दलाल वस्त्र बनकर प्रकट हुए। चीर बढ़ते गये और शत्रुओं के मुँह काले हुए।
अस नाथ के नाथ कन्हैया।
डूबत भंवर बचावत नैया॥
अर्थ ऐसे हैं नाथों के नाथ कन्हैया। डूबती नैया को भँवर से बचाने वाले।
सुन्दरदास आस उर धारी।
दयादृष्टि कीजै बनवारी॥
अर्थ सुन्दरदास ने हृदय में आशा धारण की है। हे बनवारी, दया दृष्टि कीजिए।
नाथ सकल मम कुमति निवारो।
क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
अर्थ हे नाथ, मेरी सकल कुबुद्धि निवारण करो। शीघ्र हमारे अपराध क्षमा करो।
खोलो पट अब दर्शन दीजै।
बोलो कृष्ण कन्हैया की जै॥
अर्थ अब पट खोलो और दर्शन दीजिये। बोलो कृष्ण कन्हैया की जय।
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥
अर्थ यह कृष्ण चालीसा हृदय में धारण करके जो पाठ करे, उसे अष्ट सिद्धि, नव निधि का फल और चारों पुरुषार्थ प्राप्त होते हैं।