जनक जननि पद कमल रज, निज मस्तक पर धारि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥
अर्थ माता-पिता के चरण कमलों की धूलि अपने मस्तक पर धारण करके, माँ सरस्वती की वन्दना करता हूँ जो बुद्धि और बल प्रदान करने वाली हैं।
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।
रामसागर के पाप को, मातु तुही अब हन्तु॥
अर्थ सम्पूर्ण जगत में आपकी महिमा अपार और अनन्त व्याप्त है। हे माता, रामसागर के पापों का अब तुम्हीं नाश करो।
जय श्री सकल बुद्धि बलरासी।
जय सर्वज्ञ अमर अविनासी॥
अर्थ समस्त बुद्धि और बल की राशि श्री माता की जय हो। सर्वज्ञ, अमर और अविनाशी माता की जय हो।
जय जय जय वीणाकर धारी।
करती सदा सुहंस सवारी॥
अर्थ वीणा हाथ में धारण करने वाली की जय जय जय हो। सदा सुन्दर हंस की सवारी करने वाली।
रूप चतुर्भुजधारी माता।
सकल विश्व अन्दर विख्याता॥
अर्थ चतुर्भुज रूप धारण करने वाली माता। सम्पूर्ण विश्व में विख्यात हैं।
जग में पाप बुद्धि जब होती।
जबहि धर्म की फीकी ज्योती॥
अर्थ जब जगत में पाप बुद्धि फैलती है और धर्म की ज्योति फीकी पड़ जाती है।
तबहि मातु ले निज अवतारा।
पाप हीन करती महि तारा॥
अर्थ तब माता अपना अवतार लेती हैं और पापों का नाश करके पृथ्वी का उद्धार करती हैं।
बाल्मीकि जी थे बहम ज्ञानी।
तव प्रसाद जानै संसारा॥
अर्थ वाल्मीकि जी महान ज्ञानी थे — तुम्हारे प्रसाद से सारा संसार उन्हें जानता है।
रामायण जो रचे बनाई।
आदि कवी की पदवी पाई॥
अर्थ रामायण की रचना की और आदि कवि की पदवी प्राप्त की।
कालिदास जो भये विख्याता।
तेरी कृपा दृष्टि से माता॥
अर्थ कालिदास जो विख्यात हुए, वह हे माता, तेरी कृपा दृष्टि से हुआ।
तुलसी सूर आदि विद्धाना।
भये और जो ज्ञानी नाना॥
अर्थ तुलसीदास, सूरदास आदि विद्वान और अनेक ज्ञानी जन हुए।
तिन्हहिं न और रहेउ अवलम्बा।
केवल कृपा आपकी अम्बा॥
अर्थ उन्हें किसी और का सहारा नहीं था। हे अम्बा, केवल आपकी कृपा थी।
करहु कृपा सोइ मातु भवानी।
दुखित दीन निज दासहि जानी॥
अर्थ हे माता भवानी, वही कृपा करो — इस दुखी और दीन को अपना दास जानकर।
पुत्र करै अपराध बहूता।
तेहि न धरइ चित सुन्दर माता॥
अर्थ पुत्र बहुत अपराध करे, परन्तु सुन्दर माता उसे मन में नहीं रखती।
राखु लाज जननी अब मेरी।
विनय करूं बहु भाँति घनेरी॥
अर्थ हे जननी, अब मेरी लाज रखो। मैं बहुत प्रकार से विनती करता हूँ।
मैं अनाथ तेरी अवलंबा।
कृपा करउ जय जय जगदंबा॥
अर्थ मैं अनाथ हूँ, तेरा ही सहारा है। कृपा करो, जय जय जगदम्बा।
मधु कैटभ जो अति बलवाना।
बाहुयुद्ध विष्णू ते ठाना॥
अर्थ मधु और कैटभ जो अत्यन्त बलवान थे, उन्होंने विष्णु से बाहुयुद्ध ठान लिया।
समर हजार पांच में घोरा।
फिर भी मुख उनसे नहिं मोरा॥
अर्थ पाँच हजार वर्षों तक घोर युद्ध हुआ, फिर भी उन्होंने मुख नहीं मोड़ा।
मातु सहाय भई तेहि काला।
बुद्धि विपरीत करी खलहाला॥
अर्थ उस समय माता ने सहायता की और उन दुष्टों की बुद्धि विपरीत कर दी।
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी।
पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥
अर्थ उससे उन दुष्टों की मृत्यु हुई। हे माता, मेरा मनोरथ भी पूर्ण करो।
चंड मुण्ड जो थे विख्याता।
छण महुं संहारेउ तेहि माता॥
अर्थ चंड और मुण्ड जो विख्यात असुर थे, माता ने उन्हें क्षण भर में संहार किया।
रक्तबीज से समरथ पापी।
सुर-मुनि हृदय धरा सब कांपी॥
अर्थ रक्तबीज जैसा समर्थ पापी — देवता, मुनि, हृदय और धरती सब काँप उठे।
काटेउ सिर जिम कदली खम्बा।
बार बार बिनवउं जगदंबा॥
अर्थ केले के तने की तरह उसका सिर काट डाला। बार-बार जगदम्बा की विनती करता हूँ।
जग प्रसिद्ध जो शुंभ निशुंभा।
छिन में बधे ताहि तू अम्बा॥
अर्थ जगत प्रसिद्ध शुम्भ और निशुम्भ को हे अम्बा, तुमने क्षण में वध किया।
भरत-मातु बुधि फेरेउ जाई।
रामचन्द्र बनवास कराई॥
अर्थ भरत की माता (कैकेयी) की बुद्धि फेर दी और रामचन्द्र को वनवास कराया।
एहि विधि रावण वध तुम कीन्हा।
सुर नर मुनि सब कहुं सुख दीन्हा॥
अर्थ इस प्रकार तुमने रावण का वध कराया और देवता, मनुष्य, मुनि सबको सुख दिया।
को समरथ तव यश गुन गाना।
निगम अनादि अनंत बखाना॥
अर्थ कौन समर्थ है तुम्हारे यश और गुण गाने में? वेदों ने भी अनादि और अनन्त बताया है।
विष्णु रूद्र अज सकहिं न मारी।
जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥
अर्थ विष्णु, रुद्र और ब्रह्मा भी उन्हें नहीं मार सकते जिनकी तुम रक्षा करती हो।
रक्त दन्तिका और शताक्षी।
नाम अपार है दानव भक्षी॥
अर्थ रक्तदन्तिका और शताक्षी — अपार नाम हैं, दानवों को भक्षण करने वाली।
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।
दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥
अर्थ दुर्गम कार्य पृथ्वी पर किये, इसलिए सकल जगत ने दुर्गा नाम ग्रहण किया।
दुर्ग आदि हरनी तू माता।
कृपा करहु जब जब सुखदाता॥
अर्थ दुर्ग (कठिनाई) आदि हरने वाली हे माता, जब-जब कृपा करो हे सुखदाता।
नृप कोपित जो मारन चाहै।
कानन में घेरे मृग नाहै॥
अर्थ राजा क्रोधित होकर मारना चाहे या वन में मृग (जानवर) घेर ले।
सागर मध्य पोत के भंगे।
अति तूफान नहीं कोऊ संगे॥
अर्थ सागर के बीच नौका टूट जाये, भीषण तूफान हो और कोई साथ न हो।
भूत प्रेत बाधा या दुःख में।
हो दरिद्र अथवा संकट में॥
अर्थ भूत-प्रेत की बाधा हो या दुःख में हो, दरिद्रता हो अथवा संकट में हो।
नाम जपे मंगल सब होई।
संशय इसमें करइ न कोई॥
अर्थ नाम जपने से सब मंगल होता है। इसमें कोई सन्देह न करे।
पुत्रहीन जो आतुर भाई।
सबै छांड़ि पूजें एहि माई॥
अर्थ जो पुत्रहीन होकर आतुर हो, वह सब छोड़कर इस माई की पूजा करे।
करै पाठ नित यह चालीसा।
होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा॥
अर्थ नित्य इस चालीसा का पाठ करे तो सुन्दर गुणों वाला पुत्र प्राप्त होगा।
धूपादिक नैवेद्य चढावै।
संकट रहित अवश्य हो जावै॥
अर्थ धूप आदि और नैवेद्य चढ़ाये तो संकट से अवश्य मुक्त हो जायेगा।
भक्ति मातु की करै हमेशा।
निकट न आवै ताहि कलेशा॥
अर्थ जो सदा माता की भक्ति करता है, उसके निकट कलेश नहीं आता।
बंदी पाठ करें शत बारा।
बंदी पाश दूर हो सारा॥
अर्थ बन्दी (कैदी) सौ बार पाठ करे तो बन्दी के पाश (बन्धन) सब दूर हो जायें।
करहु कृपा भवमुक्ति भवानी।
मो कहं दास सदा निज जानी॥
अर्थ हे भवानी, भवसागर से मुक्ति की कृपा करो। मुझे सदा अपना दास जानो।
माता सूरज कान्ति तव, अंधकार मम रूप।
डूबन ते रक्षा करहु, परूं न मैं भव-कूप॥
अर्थ हे माता, तुम्हारी कान्ति सूर्य के समान है और मेरा रूप अन्धकार है। डूबने से रक्षा करो, मैं भवसागर के कूप में न गिरूँ।
बल बुद्धि विद्या देहुं मोहि, सुनहु सरस्वति मातु।
अधम रामसागरहिं तुम, आश्रय देउ पुनातु॥
अर्थ हे माता सरस्वती सुनो, मुझे बल, बुद्धि और विद्या दो। अधम रामसागर को तुम आश्रय देकर पवित्र करो।