हनुमान बाहुक
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परिचय
हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास (१५३२–१६२३ ई.) द्वारा रचित हनुमान जी की एक अत्यन्त भावपूर्ण और शक्तिशाली स्तुति है। इसकी रचना के पीछे एक मार्मिक कथा है। तुलसीदास जी को अपनी भुजाओं (बाहुओं) में अत्यन्त पीड़ा हो रही थी। कोई भी उपचार काम नहीं आ रहा था। तब उन्होंने अपने आराध्य हनुमान जी की शरण ली और इस स्तुति की रचना की।
‘बाहुक’ शब्द का अर्थ है ‘बाहु का रोग’। तुलसीदास जी ने इस रचना में हनुमान जी की महिमा का गान किया और हृदय की करुण प्रार्थना की। कहा जाता है कि इस स्तुति के प्रभाव से हनुमान जी प्रसन्न हुए और तुलसीदास जी की बाहु पीड़ा दूर हो गई। यह रचना अवधी भाषा में है, जो तुलसीदास की मातृभाषा थी।
रचना-संरचना और छन्द
हनुमान बाहुक एक सुव्यवस्थित ४४-पद की रचना है जिसमें चार भिन्न शास्त्रीय छन्दों का प्रयोग हुआ है:
- छप्पय (Chhappay) — पद १–२: रोला और उद्धात को मिलाकर बना छः पंक्तियों का छन्द
- झूलना (Jhulana) — पद ३: अत्यन्त लयपूर्ण झूलता हुआ छन्द
- घनाक्षरी (Ghanakshari) — पद ४–१५, १९–३५ और ३७–४४: ३१ वर्णों का प्रचण्ड और ओजस्वी छन्द
- सवैया (Savaiya) — पद १६–१८ और ३६: गरिमामय छन्द
महत्व
हनुमान बाहुक शारीरिक पीड़ा, रोग और कष्ट निवारण के लिए अत्यन्त प्रभावशाली मानी जाती है। विशेषकर हाथ, बाहु और शरीर के अंगों के रोगों में इसका पाठ किया जाता है। इसमें तुलसीदास जी की अटूट भक्ति, हनुमान जी के प्रति अगाध विश्वास और श्रीराम की महिमा का वर्णन है।
पाठ विधि
- मंगलवार और शनिवार को इस स्तुति का पाठ विशेष फलदायी होता है।
- हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के समक्ष बैठकर पाठ करें।
- पाठ से पूर्व हनुमान जी को सिन्दूर और चमेली का तेल अर्पित करें।
- शारीरिक पीड़ा या रोग होने पर श्रद्धापूर्वक नियमित पाठ करना चाहिए।
- हनुमान जयन्ती के दिन पाठ करना विशेष शुभ माना जाता है।